राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस एवं अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस

राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस एवं अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस National Children Rights Day And International Children Day 20 November

बचपन बहुत सारी ऊर्जा लिए, मासूमियत, खेलकूद व शरारतों से भरा होता है। बचपन ही जीवन का वह समय है, जब रंग बिरंगी दुनिया हमें आकर्षित करती है। इस समय ना कोई चिंता होती है, ना कोई जवाबदेही होती है। बार-बार गिरना उठना दौड़ना, डर लगे तो मां के आंचल से लिपट जाना, कहानियां सुनना और राजा की तरह सोना, ये खुशी के पल जीवन की नींव रखते हैं। इसी समय में सीखी गई बातें जीवन की नीव बनती है।

बच्चा गीली मिट्टी की तरह से होता है। उन्हें जैसे संस्कार और व्यवहार मिलता है, उसी से उस बच्चे के जीवन में उसका व्यवहार स्वभाव विचार और स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं। यह सब बचपन के जीवन पर ही निर्भर करते हैं। इसी समय में शारीरिक व मानसिक विकास होता है, इसलिए हर बच्चे को स्वस्थ, समृद्ध व संस्कार पूर्ण बचपन देना उनका अधिकार है।

विश्व बाल दिवस व भारतीय बाल अधिकार दिवस कब मनाया जाता है?

साल 1954 में पहली बार विश्व बाल दिवस को सार्वभौमिक बाल दिवस के रूप में मनाया गया। इसे 20 नवंबर को मनाया गया। 20 नवंबर, 1959 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बाल अधिकारों की घोषणा को स्वीकार किया था, तथा इसी दिन 20 नवंबर, 1989 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बाल अधिकारों पर कन्वेंशन को भी स्वीकार किया था। इसलिए, 20 नवंबर को विश्व बाल दिवस मनाया जाता है।

भारत में विश्व बाल दिवस को राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि बच्चों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा सके, ताकि वे अपने साथ हो रहे अन्याय के बारे में आवाज उठा सकें।

बाल अधिकार कानून क्या है? व इसके उद्देश्य।

राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस मनाने का उद्देश्य बालकों के अधिकारों की देखभाल करना व उनके लिए आवश्यक शिक्षा के लिए जागरूकता फैलाना है। कई कुरीतियों जैसे बाल विवाह, बाल मजदूरी, शोषण, तस्करी करना आदि को रोकना इसका उद्देश्य है।

साथ ही साथ विश्व बाल दिवस का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समाज में बालकों के अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। दुनिया भर में बच्चों में सहयोग व सामंजस्य स्थापित करना है, तथा बालकों के कल्याण के लिए योजनाओं का क्रियान्वयन करना है।

अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस थीम 2020

हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस पर कोई न कोई थीम रखा जाता है, 2020 में इसका थीम है।

“Investing in our Future means investing in our children”

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग NCPCR

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना 5 मार्च, 2007 को अधिनियम 2005 के तहत की गई। इसकी स्थापना का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना, अधिकारों के हनन होने पर कार्यवाही करना यदि किसी रूप में बालकों  के अधिकारों का हनन होता है तो, किसी भी भाषा में इस आयोग में शिकायत दर्ज कराई जा सकती हैं।  राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का कार्य बाल अधिकारों के लिए बनाए गए कानूनों को सार्वभौमिक रूप से लागू करवाना भी है।

भारतीय संविधान में बाल अधिकार(बाल अधिकार कानून टिप्पणी)

  • अनुच्छेद 21A – 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को अनिवार्य और निशुल्क प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 24 – 14 साल की उम्र तक बच्चों को जोखिम वाले कार्य करने से सुरक्षा प्रदान करना।
  • अनुच्छेद 39E – आर्थिक जरूरतों के कारण जबरदस्ती बच्चों से ऐसे काम करवाना जिसके लिए उनकी आयु अनुकूल नहीं है, उससे सुरक्षा का अधिकार।
  • अनुच्छेद 39F – बच्चों को स्वतंत्र व गरिमा मय माहौल देना, स्वास्थ्य, विकास के अवसर और सुविधाएं देना, तथा शोषण से बचाना।

इसके अतिरिक्त बच्चों  को व्यस्को वाले सभी अधिकार भी प्राप्त हैं, जिनमें

  • अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
  • अनुच्छेद 15 – भेदभाव के विरुद्ध अधिकार
  • अनुच्छेद 21 – व्यक्तिगत स्वतंत्रता व कानून की सम्यक प्रक्रिया का अधिकार
  • अनुच्छेद 46 – बंधुआ मजदूरी सामाजिक अन्याय और शोषण से सुरक्षा का अधिकार

 

बालकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून

बच्चों को लेकर कई चिंताएं भयावह हैं, जैसे बाल श्रम, दुर्व्यवहार, असुरक्षित प्रवास, पेशेवर यौन शोषण, गैरकानूनी खरीद बेच, घरेलू कार्य, मानव अंगों का कारोबार, भिक्षावृत्ति आदि।

इन सभी कार्यों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, तथा बच्चों के साथ इस तरह के अन्याय और अपराध के विरुद्ध कई कड़े कानून बनाए गए हैं।

  • 1 नवंबर, 2007 से अधिनियम 2006 के तहत बाल विवाह पर रोक लगा दी गई है।
  • बाल श्रम अधिनियम 2016 में अधिनियम 1986 में संशोधन किया गया। जिसके अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से मजदूरी करवाना कानूनी अपराध है। इसके साथ ही 14 से 18 वर्ष के बच्चों से खतरनाक क्षेत्रों में काम करवाना भी निषेध किया गया है।

    ऐसा करने पर 20 से ₹50000 जुर्माना या 6 महीने से 3 साल की कैद या दोनों हो सकते हैं।

  • 2012 में पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण के लिए बनाया गया। इन अपराधों की सुनवाई एक विशेष कोर्ट में की जाती है। इसमें अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग सजा का प्रावधान है। बच्चों का यौन शोषण करने पर उम्रकैद या मौत की सजा का प्रावधान है।
  • किशोर न्याय अधिनियम 2015 के अनुसार कानून में जूझ रहे बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए गए हैं।

पूरी दुनिया में बचपन को जीवन का स्वर्णिम काल माना जाता है। बचपन स्वतंत्रता, खेल, आनंद से भरा होता है। इस उम्र में कोई उत्तरदायित्व है। जवाबदेही नहीं होती, इस उम्र में बच्चों की बौद्धिक शक्ति भी कम होती है, और  इसलिए उन्हें आसपास खतरो का आभास नहीं होता। उन्हें इन खतरों से बचाने के लिए उन्हें संरक्षण की आवश्यकता होती है, ताकि उनकी रक्षा हो सके तथा भविष्य के लिए उनका विकास सुनिश्चित किया जा सके।

भारत में आबादी का 40% बच्चे हैं वे सब सामाजिक, आर्थिक और राजनीति की तरफ से असहाय होते हैं, इसलिए उनकी  सुरक्षा सुनिश्चित करना बहुत आवश्यक है।

धन्यवाद

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